‘गब्बर इज बैक’ जैसी हकीकत: अपोलो अस्पताल ने बिना बीमारी के बना दिया हजारों का बिल किया, जहर खाने के ‘नाटक’ को ICU तक ले गए डॉक्टर्स
कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। अक्षय कुमार की फिल्म ‘गब्बर इज बैक’ तो आपने देखी होगी, जिसमें अस्पताल मुर्दों का इलाज कर बिल वसूलते हैं। ऐसा ही कुछ हकीकत में देखने को मिला है ग्वालियर के नामी अपोलो अस्पताल में! जहां एक बेटी के छोटे से झूठ और अस्पताल की बड़ी ‘लूट’ ने एक पिता को बेबस कर दिया। महज 4 घंटे का बिल 38 हजार और फिर देखते ही देखते बिल पहुंचा 67 हजार के पार!
डॉक्टरों ने मौके को ‘कमाने’ का जरिया बनाया
दरअसल मामला 7 तारीख का है। एक घर में पिता और बेटी के बीच मामूली झगड़ा हुआ। बेटी ने गुस्से में आकर जहर खाकर बेहोशी का नाटक किया। डरा हुआ पिता आनन-फानन में अपनी लाडली को लेकर शहर के साईं बाबा मंदिर रोड अपोलो अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड पहुंचा। पिता को लगा कि डॉक्टर जान बचाएंगे, लेकिन आरोप है कि डॉक्टरों ने इस मौके को ‘कमाने’ का जरिया बना लिया।
4 घंटे का 38 हजार का बिल
बेटी के नाटक को डॉक्टरों ने ‘हाई रिस्क’ बताकर सीधे ICU में भर्ती कर लिया। 10 हजार रुपए एडवांस भी जमा करा लिए गए। लेकिन रात 11 बजे लगातार मेडिसिन लगने पर बेटी ने खुद पिता को सच बताया कि वह बिल्कुल ठीक है, तब पिता के पैरों तले जमीन खिसक गई। पिता ने तुरंत अस्पताल प्रबंधन को सच्चाई बताई, लेकिन तब तक अस्पताल अपना जाल बुन चुका था। महज 4 घंटे के अंदर पिता के हाथ में 38 हजार का बिल थमा दिया गया,लेकिंग पिता के पास तत्काल पैसे नहीं थे,तो आरोप है कि अस्पताल ने बेटी को डिस्चार्ज करने से मना कर दिया। दो दिन बीतते-बीतते बिल 68 हजार हो गया।
अस्पताल ने बेटी को ‘बंधक’ बना लिया
आरोप है कि पैसे के अभाव में अस्पताल ने बेटी को ‘बंधक’ बना लिया और पिता को मिलने तक नहीं दिया गया। अस्पताल की इस मनमानी के आगे जब पिता थक गया, तो उसने जनप्रतिनिधियों से मदद की गुहार लगाई।खबर मिलते ही कांग्रेस नेता सुनील शर्मा और समाजसेवी अनंत शर्मा अस्पताल पहुँचे। भारी दबाव और मामले के तूल पकड़ते ही अस्पताल प्रबंधन के हाथ-पांव फूल गए।आखिरकार, प्रबंधन ने अपनी गलती मानी और लगाए गए सभी अवैध चार्ज माफ कर दिए, जिसके बाद बेटी को डिस्चार्ज किया गया।
अस्पताल ने गलती तो मान ली
यह घटना सवाल उठाती है उन बड़े अस्पतालों पर,जो सेवा के नाम पर सिर्फ पैसा कमाना जानते हैं। अगर जनप्रतिनिधि समय पर न पहुंचते, तो शायद उस पिता को अपनी जमीन या गहने गिरवी रखने पड़ते। अस्पताल ने गलती तो मान ली, लेकिन क्या इस मानसिक प्रताड़ना का कोई हिसाब है?

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