रिश्ते का अंत न बने कोई क्राइम सीन
रायपुर. इन दिनों अखबार, सोशल मीडिया या फिर कोई न्यूज चैनल कुछ भी खोलते ही हनीमून मर्डर मिस्ट्री यानी राजा रघुवंशी केस से जुड़ी खबरें मिल ही जाएंगी, ये बेहद दिल दहला देनी वाली घटना है और उससे ज्यादा दिल दहला देना वाला मामला यह है कि राजा रघुवंशी और सोनम एकमात्र केस या कोई पहला केस नहीं है. हाल ही में मार्च के महीने में एक ऐसा ही केस सामने आया था जहां मुस्कान नाम की महिला ने अपने पति का ब्वॉयफ्रेंड के साथ मिल कर मर्डर कर उसकी बॉडी को ड्रम में छिपा दिया था. बात यहां किसी महिला पुरुष की है ही नहीं यहां तो बात इंसानियत की, रिश्ते के ताने बाने और बढ़ती अमानवीयता की है.
रिश्तों से विश्वास उठाता ये केस
इंदौर के एक युवा बिजनेसमैन, जो अपनी नई-नई शादी के बाद हनीमून पर मेघालय गया था, और जिसकी लाश एक खाई में मिली. शुरुआती जांच एक मिसिंग पर्सन केस थी, लेकिन कुछ ही दिनों में ये हाई-प्रोफाइल मर्डर केस बन गया शक की सुई उसकी पत्नी सोनम और उसके प्रेमी राज कुशवाहा पर जाकर टिक गई. इन कुछ महीनों का अकेला मामला नहीं है.

जब प्यार मर्डर की वजह बन जाए
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हुई कुल हत्याओं में तीसरी सबसे बड़ी वजह लव अफेयर्स या एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रहे. लव अफेयर के कारण 1,940 हत्याएं हुईं, जिसमें पहले नंबर पर झगड़े (5,103 केस और दूसरे नंबर पर निजी दुश्मनी (2,399 केस) रही. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जहां कुछ अपराधों में गिरावट देखी गई, वहीं ‘महिलाओं के खिलाफ क्राइम’ में लगातार बढ़ोत्तरी दर्ज की गई. यह समाज के भीतर गहराते अविश्वास और टूटते रिश्तों की एक भयावह तस्वीर पेश करता है.
रिश्तों की नींव हिल रही है
हमारे समाज में शादी को एक पवित्र और स्थायी बंधन माना जाता है, लेकिन तेजी से बदलते सामाजिक ढांचे और डिजिटल कनेक्टिविटी के दौर में रिश्ते उलझने लगे हैं. सोशल मीडिया, डेटिंग ऐप्स, और पर्सनल चैट्स ने पारंपरिक विश्वास को चुनौती दी है. खैर समय के साथ बदलना जरूरी है इसलिए हमें टेक्नोलॉजी तो अपनानी ही थी लेकिन क्या इतना मॉडर्न होना था कि रिश्तों की परिभाषा ही बदल जाए? कई बार ऐसे रिश्तों में बातचीत की जगह झूठ, ईगो और झूठी परफेक्ट लाइफ का दबाव आ जाता है और जब रिश्तों में दरार पड़ती है, तो उसे सुलझाने की जगह लोग हिंसा का रास्ता चुन लेते हैं.
समाज की भूमिका – चुप्पी या सहयोग?
समाज इन घटनाओं को देखकर बस हैरान होता है, लेकिन इससे आगे नहीं बढ़ता. अक्सर देखा गया है कि लोग अपने रिश्तों की सच्चाई छिपाते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि समाज क्या कहेगा ? लोग क्या सोचेंगे? इस एक सवाल ने न ने न जाने कितनी सच्चाइयों को दफन कर दिया है. वो रिश्ते जो खुलेपन, ईमानदारी और लॉयलिटी, रिस्पेक्ट पर टिके होने चाहिए, वहां अब डर, शक और छुपाव हावी हो चुके हैं. सोनम वाले केस में ही यह बातें बार-बार सभी को परेशान कर रही हैं कि अगर उसे शादी नहीं करनी थी तो अपने परिवार से बात करनी चाहिए थी. जो बात सिर्फ एक न कहने मात्र से सॉल्व हो सकती थी उसके लिए इतना षणयंत्र आखिर क्यों ? समाज को सोचना होगा.
आखिर में आपसे सवाल…
- जब रिश्ते इतने कमजोर हो जाएं कि उनका अंत कोर्ट या कब्रगाह में हो, तो क्या हमें खुद से यह सवाल नहीं पूछना चाहिए ‘क्या आज हम रिश्तों को जी रहे हैं, या बस निभा रहे है वो भी झूठ, डर और हिंसा के साए में?’ अगर रिश्ते की नींव ही झूठ है तो उसका भविष्य काला ही होगा, धीरे धीरे पर्यावरण की तरह रिश्ते भी पोल्यूटेड होते जा रहे हैं. ऐसे रिश्तों को ढोना नही बल्कि उनसे मुक्त होइए.
- बेशक कोई दबाव नहीं डाल रहा सात जन्मों का साथ निभाने का अगर आप रिश्ते में खुश नहीं हैं तो उसे इस जन्म में भी पार्टनर की सहमति से खत्म कर सकते हैं. बात यहां किसी भी जबरदस्ती के रिश्ते में बंधने की है ही नहीं बात तो बस इतनी है कि किसी भी रिश्ते का अंत ‘अतुल सुभाष’, ‘मुस्कान ड्रम केस’ या सोनम और राजा रघुवंशी के हनीमून हॉरर की तरह नहीं होना चाहिए.
जवाब हमें तलाशने हैं
आए दिन प्रेमी संग मिलकर पति की हत्या करने के मामले सुर्खियां बन रहे हैं. इनके पीछे तमाम तहें है उन तहों तक पहुंचना बेहद जरूरी है. इन घटनाओं की वजहों को महिला सशक्तिकरण से जोड़कर पेश किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर बहस बढ़ रही है कि महिलाओं को इतनी छूट मिलने से ऐसा हो रहा है. जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है. शिक्षा और आर्थिक संपन्नता से महिलाएं अपना भविष्य सुरक्षित कर रही है. उनका विकास समाज को समृद्ध कर रहा है. आपराधिक घटनाओं को आपराधिक मानसिकता की तरह देखना चाहिए, कुरीतियों पर वार करना चाहिए, बरसो पुरानी व्यवस्थाओं में सुधार करना चाहिए, बजाय महिला सशक्तिकरण को इसकी वजह बताने के.
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